उस जबान को सिर नवाइए जिस पर पहले-पहल स्वराज्य का शज्द आया. 'स्वराज्य-स्वराज्य हमें चाहिए.' यह कहा एक बूढे वशिष्ठ ने जो धर्म से पारसी थे. उनका नाम था दादाभाई नौरोजी. सचमुच वह स्वराज्य के दादा थे. देश की गुलामी की कसक थी उनके दिल में. उनकी यह धारणा थी कि यदि ठीक ढंग से स्वराज्य की बात अंग्रेजों तक पहुंचाई जाए, तो वे स्वराज्य देकर रहेंगे. दादा के 'स्वराज्य' के रुतबे को बुलंद कर दिया, लोकमान्य तिलक ने यह कह कर- 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.'
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
मंत्रीजी, होम क्वरंटाइन में घुमे जा रहे हैं
बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री कोरोनाकाल में अश्वनी चैबे की जिम्मेवारियां काफी बढ जानी चाहिए। क्योंकि आम लोग उनकी हरेक गतिविधियों खासक...
-
प्रीति सिंह (3 मिनट में पढ़ें) फिल्म 'नदिया के पार' के आखिरी लम्हे, कमरे में गूंजा और चंदन. भींगी पलकों के साथ दोनों के बीच संव...
-
'न हमें सुनते हैं, ना सुनाते हैं. टीवी वाले पत्रकार कैमरा - माइक लेके आते हैं, कलम - काॅपी वाले भी पत्रकार आते हैं. लेकिन हमसे कोई क...
-
---प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा को श्रद्धांजलि-- ---पहले उन्हें विक्टोरिया क्रॉस देना तय किया गया था--- (4 मिनट में ...

No comments:
Post a Comment
इस खबर पर आपका नजरिया क्या है? कृप्या अपने अनुभव और अपनी प्रतिक्रिया नीचे कॉमेंट बॉक्स में साझा करें। अन्य सुझाव व मार्गदर्शन अपेक्षित है.