उस जबान को सिर नवाइए जिस पर पहले-पहल स्वराज्य का शज्द आया. 'स्वराज्य-स्वराज्य हमें चाहिए.' यह कहा एक बूढे वशिष्ठ ने जो धर्म से पारसी थे. उनका नाम था दादाभाई नौरोजी. सचमुच वह स्वराज्य के दादा थे. देश की गुलामी की कसक थी उनके दिल में. उनकी यह धारणा थी कि यदि ठीक ढंग से स्वराज्य की बात अंग्रेजों तक पहुंचाई जाए, तो वे स्वराज्य देकर रहेंगे. दादा के 'स्वराज्य' के रुतबे को बुलंद कर दिया, लोकमान्य तिलक ने यह कह कर- 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.'
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मंत्रीजी, होम क्वरंटाइन में घुमे जा रहे हैं
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