Tuesday, December 23, 2008

मुंबई हमले के बाद कठोर रूख का सच्चाई


मुंबई हमले के बाद आतंकवाद के प्रति कठोर रूख को अमलीजामा पहनाने के लिए संसद में दो बिल पास किया गया है. पहले बिल में राष्टीय सुरक्षा एजेंसी (एनआइए) को कानूनीजामा पहनाने की तैयारी है, तो दूसरे में इस एजेंसी को ताकत प्रदान की गयी है. अनलॉफुल (प्रीवेंशन) एिक्टविटी एक्ट को संशोधित कर इसे और अधिक सख्त बनाने की बात कही गयी है.
एनआइए
यह एजेंसी केंद्र सरकार के तहत होगी. इसके तहत अनुसूचित अपराधों की जांच के लिए इसके अफसरों को देशर में वही अधिकार होंगे, जो पुलिस अफसरों को मिले होते हैं.
राष्टीय जांच एजेंसी बिल में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य सरकार की अनुमति के बिना ही यह अपना काम करेगी. जांच के लिए इस एजेंसी को किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहÈ पड़ेगी. किसी ी घटना पर स्वत:स्फूर्त यह एजेंसी जांच का काम शुरू कर देगी.
एजेंसी अनुसूचित अपराधों की जांच करेगी, लेकिन केंद्र सरकार के पूर्व अनुमोदन पर जांच के लिए राज्य सरकार को ी सौंप सकेगी. राज्य सरकार जांच के लिए एजेंसी को पूरी मदद करेगी.
इस एजेंसी को आतंकवाद, आर्थिक अपराध, विस्फोटक पदार्थ जैसे मामलों की जांच के लिए सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार होगा.
एनआइए के सब इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर के अधिकारी को जांच के लिए स्पेशल पावर दी जायेगी.
एनआइए के अपने स्पेशल वकील और अदालतें होंगी, जहां आतंकवाद से संबंधित मामलों की सुनवाई होगी.
इस जांच एजेंसी के कार्यक्षेत्र के लिए अपराधों को अधिसूचित किया जायेगा. इसके बाद जांच एजेंसी को इन अपराधों की जांच करने का अधिकार रहेगा.
एनआइए के अंतगर्त आनेवाले अपराधों की सूची में शामिल किसी अपराध की सीधी सूचना एजेंसी को देनी होगी.
एजेंसी एटोमिक एनजÊ एक्ट- 1962, स्पेशिफिक एक्अस फॉर इंवेस्टिगेशन-यूएनपीए, एंटी हाइजैÇकग एक्ट -1982, सार्क एक्ट-1993, वैपंस ऑफ मास डिस्टक्शन एंड देयर डिलिवरी सिस्टम एक्ट-2005 के तहत काम करेगी.
अनलॉफुल (प्रीवेंशन) एिक्टविटी एक्ट में संशोधन
ो और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए अनलॉफुल (प्रीवेंशन) एक्टिविटी संशोधन बिल ी संसद द्वारा पास किया गया है.
संदिग्ध आरोपियों को पुलिस तीन महीने तक के लिए हिरासत में रख सकती है. 90 दिनों के बाद जमानत न देने की पुख्ता वजह या सबूत पेश करने होंगे.
आतंकवादी घटनाअों के आरोपियों की सुनवाई के लिए अलग से स्पेशल अदालत की व्यवस्था होगी. उच्च न्यायालय को इसके लिए अधिकार प्रदान किया गया है. स्पेशल अदालत के न्यायाधीश सेशन जज या अतिरिक्त सेशन जज होंगे, जो हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त किये जायेंगे. लोक अियोजकों की नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा की जायेगी.
इस अदालत में सुनाई गई सजा के एक माह के अंदर ऊपरी अदालत में अपील करने की मोहलत आरोपी को दी गयी है.
आतंकवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने वाले लोगों के लिए ी सजा का प्रावधान किया गया है. इसके लिए उन्हें पांच साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा और जुर्माना तक देना पड़ सकता है. इसके अलावा आतंकवादी कारZवाई करने या इसका षडयंत्र करने पर ी ऐसी ही सजा का प्रावधान है. अगर आरोपी विस्फोटक पदार्थ रखते हुए या इसे आतंकियों को पहुंचाने का काम करते हैं, तब ी उन्हें ऐसी ही सजा ुगतनी पड़ सकती है.
विदेशी आतंकवादियों को जमानत न देने का ी प्रस्ताव है.६ अब नक्सलवाद ी आतंकवाद की श्रेणी में.

एजेंसी की अर्थव्यवस्था
एनआइए के वित्तीय व्यवस्था गृह मंत्रालय द्वारा की जायेगी. फिलहाल नये एजेंसी के गठन और इसके परिचालन के लिये लागत व व्यय का अंदाजा लगाया जाना बंाकी है. शरूआती लागत के तौर पर 2 करोड़ रुपये का और व्यय के लिये 3 करोड़ रुपये का प्रावधन किया गया है. स्पेशल कोर्ट के गठन के लिये 1 करोड़ और लोक अियोजक के नियुक्ति के लिये 50 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है. आने वाले समय में धन राशि की जरूरत के हिसाब से पूर्ति करने की बात कही गयी है.
एजेंसी पर ी रहेगी नजर
नये एजेंसी और कानून के किसी ी दुरूपयोग पर एक स्वतंत्र प्रधिकरण की निगरानी होगी. अदालत में जांच अधिकारी के समक्ष दिये गये बयान को चुनौती दी जा सकती है. 90 दिनों के बाद जमानत न देने की पुख्ता वजह या सबूत पेश करने होंगे.

सी नागरिकों पर लागू
इस बिल के प्रावधान ारत के सी नागरिकों पर लागू होगा, साथ ही विदेशों में रहने वाले ारतीयों पर ी. इतना ही नहÈ ारत सरकार द्वारा पंजी—त हवाई व पानी के जहाजों पर तैनात लोगों पर ी बिल के प्रावधान लागू होंगे. मामले की सुनवाई इन कैमरा हो सकता है, अगर स्पेशल कोर्ट, गवाह या लोक अियोजक इसकी जरूरत समझें.

मुंबई हमले के बाद आम लोगों में उपजे असंतोष के कारण सरकार को नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी का गठन करना पड़ा. लेकिन इस एजेंसी से आतंकवाद की घटनायें कम हो जायेंगी, यह नहÈ कहा जा सकता है. यह एजेंसी सिर्फ आतंकी घटनाओं की जांच करने और वििé खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय का काम करेगी. देश में कागज पर काफी अच्छी नीतियां बनती है, लेकिन उसका सही तरीके से क्रियान्वयन नहÈ हो पाता है. जांच के लिए सीबीआइ जैसी एजेंसी पहले ही से मौजूद है, जो राजीतिक इस्तेमाल का औजार बन कर रह गयी है. एनआइए, सीबीआइ से केवल इस मामले में अलग है कि इसे किसी घटना की जांच के लिए किसी मंजूरी की जरूरत नहÈ पड़ेगी. इसमें पोटा के प्रावधानों को लागू नहÈ किया गया है. पोटा कानून में टेलीफोन इंटरसेप्सन, पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिये गये बयान को साक्ष्य के तौर पर मानने और अियुक्त को स्वयं ही अपनी बेगुनाही साबित करने जैसे सख्त प्रावधान शामिल थे. आतंकवाद से निपटने के लिए सख्त कानून होने ही चाहिये.
आतंकवाद ही नहÈ अन्य अपराधों को रोकने के लिए इंटेलीजेंस और जांच की अलग एजेंसी होनी चाहिए. जिस प्रकार आतंकवाद और अपराध का स्वरूप बदल रहा है, उसे देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों खासकर पुलिस बल की टेÇनग को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है. पुलिस को आधुनिक टेÇनग देने की बात काफी पुरानी है और हर आतंकी वारदात के बाद यह बात सामने आती है कि खुफिया एजेंसियों में काफी पद रिक्त है. ऐसे में सरकार इस ओर कदम उठाने की बजाय एक नयी एजेंसी बनाकर इस समस्या से निजात नहÈ पा सकेगी. काफी समय पहले आइबी के अधीन ज्वाइंट टेरेरिज्म टास्क फोर्स का गठन किया गया था. इस टास्क फोर्स का काम ी वििé खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय बनाना था, जो आज तक पूरा नहÈ हो पाया है.एनआइए को अगर सफल होना है, तो उसे एक सेंटल डाटाबेस तैयार करना होगा साथ ही इसे राजनीतिक दखलंदाजी से ी मुक्त रखना होगा. वरना यह ी अन्य एजेंसियों की तरह ही अक्षम साबित होगी. लगातार हो रही आतंकी घटनाओं के बाद आखिकार सरकार की नÈद टूटी और उसने आनन-फानन में नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी का गठन कर दिया. सरकार द्वारा उठाया गया कदम स्वागत योग्य है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह एजेंसी कैसे और किस तरीके से काम करेगी. सरकार ने इस एजेंसी का गठन चुनावों को ध्यान में रखकर किया है. सबसे पहले इसका ढांचा कैसा होगा, केंद्र और राज्य खुफिया के बीच कैसे तालमेल बनाया जायेगा, इसमें कौन लोग शामिल होंगे और यह राष्टीय सुरक्षा सलाहकार या गृह मंत्रालय के अधीन काम करेगा, ये बातें स्पष्ट करनी चाहिए. इन सी बातों पर विचार कर इसका गठन करना सही होता. यह सही है कि देश में जांच के लिए कई एजेंसियां मौजूद है, लेकिन आतंकी घटनायें राज्यों का ही नहÈ, बल्कि पूरे देश का विषय है. आतंकवादियों के तार दूसरे राज्यों से ही नहÈ बल्कि अन्य देशों से ी जुड़े होते हैं, ऐसे में वििé एजेंसियों के जांच में शामिल होने से बाधा उत्पé होती है. मुंबई हमले के तार रामपुर सीआरपीएफ कैंप के आरोपी से जुड़े पाये गये हैं. ऐसे मामलों में केंद्रीय एजेंसी का महत्व काफी बढ़ जाता है. आतंकी घटनाओं को रोकने के लिये सरकार को आंतरिक सुरक्षा के ढांचे को मजबूत बनाना होगा.
सबसे पहले पुलिस बल और आइबी को राजनीति से मुक्त करना होगा. आइबी का उपयोग खुफिया जानकारी एकत्र करने के बजाय राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है. इसे बदलने की जरूरत है. आतंकी घटनाओं के कारण आम लोगों में गुस्सा है. इस गुस्से की वजह से ही सही पुलिस सुधार की वषोंZ पुरानी मांग पर ी अमल होने की उम्मीद बंधी है. आतंकवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा एजेंसियों की चुस्ती के साथ ही कठोर कानून ी होने जरूरी है. सरकार ने अनलॉफुल एिक्टविटी प्रीवेंसन एक्ट में कुछ बदलाव किये हैं, लेकिन कानून पोटा प्रावधानों की तरह सख्त नहÈ है. आतंकियों के मन में य पैदा किये बिना, उनसे नहÈ निपटा जा सकता है. वर्तमान सरकार राजनीतिक वजहों से पोटा के प्रावधानों को लागू नहÈ करना चाहती है. कड़े कानून एंटी डिटरेंस का काम करते है. बाहरी खुफिया एजेंसी रॉ को ी दुरूस्त बनाने की जरूरत है. आतंकवादियों को यह संदेश देने की जरूरत है कि अगर वे आतंकी घटना को अंजाम देंगे, तो पकड़े जाने पर उन्हे सख्त सजा दी जायेगी और वे जहां से ी आयेंगे वहां जाकर ी ारतीय सुरक्षा एजेंसी कारZवाई कर सकती है. राजनेताओं को बयानबाजी और कोरे आश्वासन बंद कर सख्त कारZवाई करनी ही होगी. आंतरिक और बाह्य सुरक्षा एजेंसियों को बेहतर और आतंकियों के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति अपना कर इस जंग से पार पाया जा सकता है.

Tuesday, December 16, 2008

भारत-अमेरिकी संबंधभारत


और अमेरिका का संबंध प्यार और घृणा का अनूठा नमूना है। भारतीय स्वतंत्रता संघशZ के दिनों में राश्ट्रीय आंदोलन को अमेरिकी उदारपंथियों का सामान्य तौर पर और पिछली सदी के तीसरे दषक में राश्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के लंबे प्रषासन के दौरान अमेरिकी प्रषासन एवं जनमत का स्पश्ट समर्थन ब्रिटेन के प्रति था, जो अनुदारवादियों और सम्राज्यवादियों के लिए एक इरिटेंट था विषेशतौर पर द्वितीय विष्वयुद्ध के दौरान। ब्रिटेन के प्रख्यात प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का, जिनकी यह टिप्पणी कि `वे ब्रिटिष सम्राज्य के विघटन का नेतृत्व करने के लिए प्रधानमंत्री नहीं बने हैं, विष्व भर के उदारपंथियों के लिए नागवार था। परंतु अमेरिका में इसपर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और चर्चिल एवं रूजवेल्ट में मतभेद का यह एक विषेश मुद्दा था। अत: यह अपेक्षा की जाती थी कि स्वतंत्र भारत और अमेरिका का आपसी संबंध दोस्ताना और मधुर होगा। सामान्यतौर पर दो बड़े जनतांत्रिक देषों के पारस्परिक रिष्ते दोस्ताना तौर पर प्रगाढ़ होने की अपेक्षा दोनों पक्षोें में थी और दोनों का प्रारिम्भक रूझान काफी समारात्मक था। परंतु दुर्भाग्य से समस्याओं की राजकीय व्यवस्था पर बुनियादी तौर पर आम सहमति होने पर भी कालांतर में विभेद के स्वर तीव्र होते गए। अमेरिका और भारत के संबंधों की अपेक्षायें इससे भी आंकी जा सकती है कि द्वितीय विष्वयुद्ध की संध्याकाल में सैनफ्रांसिस्को में राश्ट्र संघ की स्थापना सम्मेलन में भारतीय उपनिवेष को भी पूर्ण सदस्य बनाया गया था। इस सम्मेलन में स्पश्टतौर पर अमेरिका के समर्थन से ही यह संभव हो पाया था।अत: 1949 में जब भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका की प्रथम यात्रा की तो उनका भव्य स्वागत हुआ था। दुर्भाग्य से भारत-अमेरिका संबंध में तनाव की ‘ाुरूआत भी पंडित जी की इस यात्रा से ‘ाुरू भी हुई। कहा जाता है कि न्यूयार्क में प्रमुख उद्योगपतियों द्वारा आयोजित रात्रि भोज के दौरान किसी धन कुबेर ने जवाहरलाल जी से यह कहा कि प्रधानमंत्री जी आपको यह अहसास होना चाहिए कि आप अरबों डॉलर के नियंत्रकों के साथ भोज में ‘ारीक हैं। परोक्ष तौर पर उस महावाच का यह आषय था ि कइस बात पर आपको गर्व होना चाहिए। इसपर प्रत्यक्ष रूप से पंडित जी ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन भारतीय राजदूत और अपने प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों के बीच यह जरूर कहा कि `प् ींअम दमअमत उमज ेव उंदल पकपवजे ूीव ूमतम ेव पिसजीसल तपबी´। अमेरिकी मीडिया में यह प्रकाषित हो गई जिसपर प्रतिकूल प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। इसी दौरान अमेरिका की दिग्गज वाहन निर्माता कंपनी जनरल मोटर्स की भारत में `प्रवेष प्रस्ताव´ को भारत सरकार ने ठुकरा दिया था और ब्रिटिष एवं इटालियन कंपनियों को वाहन निर्माण के क्षेत्र में पूंजी निवेष की अनुमति दी थी जिसके तहत ब्रिटेन की मौटीस मोटर्स और इतावली कंपनी फीयट को भारत में पूंजी निवेष की सुविधा मिली। दूसरा प्रतिकूल प्रभाव दोनों देषों के रिष्ते पर पड़ना प्रारम्भ हो गया। इसी प्रकार भारत के औद्योगिक विकास में अमेरिकी निवेष बुनियादी क्षेत्रों जैसे इस्पात आदि में न होकर कृिश विकास के प्रति होना भी संबंधों के सकारात्मक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ना प्रारम्भ हो गया था। इसी बीच `षीत युद्ध´ प्रारम्भ हो गया। द्वितीय विष्व युद्ध के दौरान याल्टा में युद्ध के तीनों प्रमुख विजेताओं - रूजवेल्ट, चर्चिल एवं स्टालीन के बीच आपसी समझौता के तहत पिष्चमी राश्ट्रों और सोवियत रूस के बीच हुई `स्फेयर ऑफ इन्लूयंस´ संबंधी समझौते को मास्को की सह पर ग्रीस के साम्यवादियों ने तोड़कर गुरिल्ला युद्ध प्रारम्भ कर दिया था। यह पिष्चमी राश्ट्रों विषेशतौर पर इसके नेता अमेरिका को काफी नागवार लगा था और प्रतिक्रिया स्वरूप राश्ट्रपति ट्रूमन, जो रूजवेल्ट के निधन के पष्चात्त उपराश्ट्रपति होने के नाते ह्वाईट हाऊस के नये प्रभारी थे, अपने दस सूत्रीय कार्यक्रम की घोशणा की जिसे इतिहास `ट्रूमन डॉक्ट्रीन´ के रूप में जानता है। इसी संदर्भ में सोवियत रूस की विस्तारवादी नीति पर ब्रेक लगाने के लिए उत्तर अटलांटिक संगठन (नाटो) की स्थापना हुई जिसकी कई दषकों तक ‘ाीतयुद्ध संचालन में प्रमुख भूमिका रही। ‘ाीतयुद्ध के दरम्यान विषेशतौर पर 1952 में अमेरिकी प्रषासन में तब्दीली आने के साथ विदेष नीति में भारी बदलाव आया। अमेरिकी इतिहास विषेशतौर पर पांचवां दषक विषेशतौर पर उल्लेखनीय है क्योंकि यह अवधि सिनेटर मैकार्थी और जॉन फॉस्टर के काले कारनामों से प्रसिद्ध है। इस तरह राश्ट्रपति आइजनऑवर के प्रथम ‘ाासकीय काल - ‘ाीतयुद्ध की भयंकर लहर की चपेट का षिकार हुआ। सोवियत रूस और चीन, जहां 1949 में कम्युनिश्टों ने राश्ट्रवादियों को पराजित कर चीन की मुख्य भूमि पर अपना ‘ाासन स्थापित करने में सफल हुआ था, की घेराबंदी करने के उद्देष्य से सैनिक संगठनों का विष्वव्यापी ताना-बाना बुनने की नीति अपनाई थी जिसके तहत सीटो - साउथ-ईस्ट ट्रीट्री संगठन, आनसाज - आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि, सेन्टो - मेडो - मिडिल ईस्ट यानि मध्य-पूर्व सैन्य संगठन आदि सैनिक संबंधों का ताना-बाना ऐसा बुना कि जो देष इसकी सदस्यता से इंकार किए वे `अनैतिक´ और अमेरिका विरोधी घोिशत कर दिए गए।भारत की नीति स्वाभाविक तौर पर इसके भिन्न थी। सदियों की गुलामी से जर्जर उपनिवेषों को एकजुट करना और विष्वमंच पर इनकी विषेश पहचान बनाने की थी। सम्राज्यवाद के अवषेश की पूर्ण आहुती के साथ एषिया एवं अफ्रीका के नवोदित राश्ट्रों की विष्व मंच पर विषेश पहचान बनाने की भारतीय नेतृत्व की हर संभव कोषिष रही। इस दिषा में इंडोनेषिया की स्वतंत्रता के प्रष्न पर भारत ने 1946 में नई दिल्ली में प्रथम `एषियन रिलेषन्स कांफ्रेंस´ का आयोजन कर विष्व समुदाय को नये भारत की विदेष नीति के संबंध में स्पश्ट संकेत दे दिया था। संयोगवष इस सम्मेलन में राश्ट्रपिता महात्मा गांधी का उद्बोधन आज भी प्रासंगिक माना जाता है। इस सम्मेलन के आयोजन से भारत ने विष्व मंच पर एक अच्छी ‘ाुरूआत की जिसकी चरमोत्कशZ अभिव्यक्ति 1955 में इंडोनेषिया के रमणीक ‘ाहर बांडुंग में हुई, जिसे इतिहास बांडुंग सम्मेलन के नाम से पुकारता है। इस सम्मेलन की सफलता ने भारत की विदेष नीति में चार चांद लगा दिए थे। लेकिन यह अमेरिकी नीतिकारों को काफी अखरा था और उनकी नजर में अंतर्राश्ट्रीय स्तर पर गुटनिरपेक्षता एक अनैतिक प्रयास था जो सोवियत संघ का तरफदार था। चीन भी विष्व मंच पर इसी बांडुंग सम्मेलन में धमाकेदार तौर पर भारत के `पैट्रोनेज´ में अपनी उपस्थिति जताने में सफल हुआ। यह बात दूसरी है कि बाद में चीनी नेताओं ने इसे अनदेखा किया।भारत-अमेरिकी संबंधों में 1962 में चीनी आक्रमण के समय प्रगाढ़ता अवष्य आई। तत्कालीन राश्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी राश्ट्रपिता महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विषेशतौर पर प्रषंसक थे। भारत के विरूद्ध चीनी आक्रमण को उनके ‘ाासन ने एक सुनहले अवसर के तौर पर अपनाया और भरपूर सैनिक सहायता दी तथा जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसी सिलसिले में वाषिंगटन की यात्रा की थी तो उनकी सम्मानपूर्वक अच्छी आवभगत हुई थी। नेहरू की इस यात्रा में संबंधों में पिछले दिनों की खटास का नाम मात्र का भी असर नहीं दिखा। लेकिन राश्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या के पष्चात्त जॉनसन के राष्ट्रपतित्व काल में दोनों देषों के संबंधों में खटास का बेताल पुन: गाछ पर जा बैठा। वियतनाम की समस्या विष्व मंच पर प्रखर तौर पर उभर कर आई और भारत को अमेरिकी नीति का पुरजोर तौर पर विरोध करने की मजबूरी थी। वियतनाम में अमेरिकियों ने फ्रांसीसी सम्राज्यवादियों की जगह ली। फ्रांस की वहां नाम मात्र की उपस्थिति थी। परंतु वियतनाम युद्ध वशोZं तक खींचता चला गया जिसमें अमेरिका को जान-माल की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। इस संदर्भ में भारत-अमेरिकी संबंधों में आई तनाव वियतनाम से संबंधित पेरिस ‘ाांति वार्ता में प्रथम चरण में भारत को ‘ारीक नहीं किया गया था। फिर राश्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का ‘ाासनकाल आया जिसमें अंतर्राश्ट्रीय विशय के प्रसिद्ध विद्वान हेनरी किसिंगर को अपना विदेष सचिव नियुक्त किया गया। नई दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हो चुका था और लालबहादुर ‘ाास्त्री जी अल्पकालीन प्रधानमंत्रित्व (1964-1966) के पष्चात्त इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। इस दरम्यान भारत की आंतरिक राजनीति में काफी कुछ गड़बड़झाल रहा और 1969 में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी में भारी विभाजन हुआ। इस अलगाव का नेतृत्व मुख्यतौर पर उन लोगों ने किया था जिन्होंने 1966 में लालबहादुर ‘ाास्त्री के निधन के पष्चात्त इंदिरा गांधी को देष की सर्वोच्च सत्ता पर अवस्थित किया था।कांग्रेस पार्टी के इस विभाजन से केंद्र की सरकार अल्पमत में आ गई थी। परिणामस्वरूप उसे संसद में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए उसे वामपंथियों - कम्युनिश्टों पर निर्भर होना पड़ रहा था। स्थिति की नाजुकता पहचानते हुए संसद (लोकसभा) को भंग कर 1971 में आम चुनाव हुआ जिसके फलस्वरूप इंदिरा गांधी को भारी बहुमत मिला। संसद के विघटन के पूर्व 14 बैंकों के राश्ट्रीयकरण कर इंदिरा जी ने देष के आम लोगों में यह धारणा स्थापित कर दी थी ि कवे आर्थिक परिवर्तन की हिमायती हैं और कांग्रेस से अलग हुए गुट इसके विरोधी हैं। भारत में 1971 के आम चुनाव के पष्चात्त पाकिस्तान में भी आम चुनाव हुए जिसके परिणामस्वरूप बंगबंधु ‘ोख मुजीबुरZ रहमान की पार्टी आवामी लीग का पाकिस्तानी संसद में बहुमत हो गया था जो देष के `असली´ सत्ताधारी ग्रुप `पंजाबी लॉबी´ को नागवार लगा था। इसके पष्चात्त सेना ने दूसरी बार सर्वोच्च सत्ता पर कब्जा जमा लिया और जनरल याहया खां देष के सर्वोच्च ‘ाासक बन बैठे। बंग्लादेष के निर्माण में भारत की विषेश भूमिका थी। इससे अमेरिका जो ब्रिटिष, फ्रांसीसी, डच एवं पुर्तगीज सम्राज्यवादियों का इस क्षेत्र में अपने को एकमात्र उत्तराधिकारी समझ बैठा था, को गहरी चोट लगी और तिलमिला कर राश्ट्रपति निक्सन ने अपनी आणविक अस्त्रों से लैस नौ सेना के `छठवें बेड़े´ को भारत पर दबाव बनाने के लिए बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया था। लेकिन भारतीय रणनीतिकार और फौज ज्यादा चुस्त और चालाक निकली और उसके पहुंचने से पूर्व ही युद्ध के इतिहास का सबसे बड़ा सैनिक समर्पण करा लिया गया था। पाकिस्तानी सेना की लगभग नब्बे हजार फौजियों ने जनरल नियाजी के नेतृत्व में भारतीय सेना के पूर्वी एरिया कमांडर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके थे। लगता है इस स्थिति से राश्ट्रपति निक्सन, जिन्हें कोल्डवारियर के रूप में अंतर्राश्ट्रीय समुदाय में देखा जाता था, बौखलाकर अपने विदेष सचिव हेनरी किसिंगर को चीन से दोस्ती करने के लिए हरी झंडी दे दी थी और जिसका उपयोग उन्होंने पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद से बीजिंग की सीधी यात्रा के लिए किया था। तब से भारत-अमेरिकी संबंध में ‘ाीत युद्ध के उपरांत भी अंदरूनी अपनापन नहीं बन पाया। 1998 में पोखरण द्वितीय केे कारण अमेरिका और उसके सहयोगी पुन: बौखला गए थे और भारत की आर्थिक नाकेबंदी करने की भरपूर कोषिष की गई। जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा और स्कैंडनेवियन देषों ने इसमें काफी सक्रियता दिखाई थी। सुरक्षा परिशद् के सदस्य देषों में सिर्फ रूस और फ्रांस ने ही हमारे प्रति सहानुभूति दिखाई थी।
फिर 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार आई। डॉ. मनमोहन सिंह एक विद्वान अर्थषास्त्री रहे हैं और वे अमेरिका से निकटता के हिमायती रहे हैं। अत: उन्होंने हिम्मत करके अमेरिका के साथ 123 संधि की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी। इसमें संयुक्त गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी का समर्थन उन्हें प्रारम्भ से ही था। स्पश्ट है कि इतनी महत्वपूर्ण संधि करने की बात वे सोनिया गांधी की सहमति के बिना सोच भी नहीं सकते थे। परंतु वामपंथी सहयोगियों के दबाव में इसमें किंतु-परंतु लगता रहा जो अंतोगत्वा सरकार द्वारा विष्वास मत प्राप्त करने के पष्चात्त यह प्रकारण समाप्त हो गया। इस समझौते के पीछे राश्ट्रपति जॉर्ज बुष ने अपने प्रषासन की पूरी ‘ाक्ति लगा दी थी।अब राश्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा, जो जन्म और बचपन के पालन-पोशण से ही अंतर्राश्ट्रीय हैं और गरीब, अभाव, उपेक्षा की अनुभूति रखते हैं, भारत के प्रति उदार और दोस्ताना दृिश्ट रखेंगे। अपने चुनावी अभियान में पार्टी के अंदर उम्मीदवारी के दौरान हुए संघशZ तथा आम चुनाव में हनुमान जी की मूर्ति हमेषा लॉकेट के तौर पर पहने रखते थे, भारत केे प्रति सहयोगात्मक नीति अपनायेंगे, दूसरी विषेश अपेक्षा है। इसके अलावा हिलेरी िक्लंटन की विदेष सचिव के पद पर नियुक्ति भी हमारे लिए ‘ाुभ सूचक है। दोनों का अमेरिकी-भारतीय समुदाय से भी गहरा दोस्ताना संबंध है और यह समुदाय अमेरिकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में उत्तरोत्तर प्रभावषाली भूमिका अदा कर रहा है जो भारत-अमेरिका संबंधों में मधुरता के लिए सकारात्मक संकेत देता है। परंतु अमेरिका और पूरा विष्व जिस आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है और इससे निजात पाने के लिए सभी अंधकार में भी समुचित समाधान टटोल रहे हैं एक ऐसी गंभीर स्थिति को जन्म देता है जहां भारत को ‘ाायद अपने स्वयं के बूते पर वैिष्वक मंदी से उबरने का रास्ता खोजना पड़ेगा। 26/11 को मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के संदर्भ में अमेरिकी नीति भारत-अमेरिकी संबंधों की प्रगाढ़ता की गति तय करेगा।

Monday, December 15, 2008

मैं कसाब बोल रहा हूँ


उम्र: 21 साल, रोजगार- मजदूरी,आवास- फरिदकोट, तहसील- दिपालपुर, जिला-उकदा, राज्य-पंजाब. पाकिसतानमैंने अपने जन्म से उपर्युक्त स्थान पर रहता आया हूं। मैंने चौथी कक्षा तक गर्वमेंट प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की. वर्ष 2000 में स्कूल छोड़ने के बाद लाहौर चला गया. मेरा भाई अफजल लाहौर के गली नंबर 54, मकान संख्या 12, मोहल्ला तोहित अबाद, यादगार मिनार के पास रहता है। मैं 2005 तक कई जगहों पर मजदूरी की। इस दौरान में अपने पुश्तैनी मकान भी जाता रहा. वर्ष 2005 में मेरा, मेरे पिता के साथ झगड़ा हो गया. इसलिए, मैं घर छोड़कर लाहौर के अली हजवेरी दरबार चला गया. मुझे बताया गया था कि यह, वह स्थान है, जहां घर से भागे लड़कों को पनाह मिलती है और यहां से लड़कों को दूसरे स्थानों पर रोजगार के लिए भेजा जाता है. एक दिन जब मैं वहां था, एक शफीक नाम का लड़का आया और वह मुझे अपने साथ ले गया. वह कैटरिंग का व्यवसाय करता था. शफीक झेलम का रहने वाला था. मैं उसके साथ दिहाड़ी पर काम करने लगा. मुझे रोज के 120 रुपये मिला करते थे. कुछ दिनों बाद मेरी दिहाड़ी 200 रुपये हो गई. मैंने शफीक के साथ 2007 तक काम किया. शफीक के साथ काम करते हुये ही मैं मुजफर लाल खान (उम्र-22 वर्ष, आवास/गांव- रोमिया, तहसील और जिला-अटक, राज्य-सरहद, पाकिस्तान) के संपर्क में आया. हमने लूटपाट/डकैती करने का मन बनाया, क्योंकि हम अपनी आमदनी से संतुष्ट नहीं थे. ऐसा सोच कर हमने नौकरी छोड़ दी. इसके बाद हम रावलपिंडी चले गये. वहां हमने बंगश कॉलोनी में एक फ्लैट किराये पर लिया और रहना शुरू कर दिए. अफजल ने डाका डालने के लिए एक घर को चुन लिया, जहां उसे ज्यादा माल मिलने की उम्मीद थी. उसने डाका डालने से पहले उस घर के बारे में अच्छी तरह से जानकारी ले ली और नक्शा भी बना लिया. इसके लिए हमें बंदूकों की आवश्यकता थी. अफजल ने मुझसे कहा कि वह बंदूक की व्यवस्था अपने गांव से कर सकता है, लेकिन इसमें बहुत खतरा है, क्योंकि वहां हमेशा चेकिंग होती रहती है.पहली मुलाकातबकरीद के दिन रावलपिंडी में जब हम हथियार ढूंढ रहे थे, राजा बाजार में हमें कुछ लश्कर-ए-तोयबा के स्टॉल दिखे. हमने सोचा कि आज हम हथियार पा भी लें तो उसे चला नहीं पाएंगें. इसलिए हथियार प्रशिक्षण के लिए लश्कर-ए-तोयबा में शामिल होने का निर्णय लिया. पूछताछ कर हम लश्कर के ऑफिस में पहुंच गए. वहां मौजूद एक व्यक्ति से हमने शामिल होने की मंशा जाहिर की. उसने हमसे कुछ पूछताछ की, हमारा नाम और पता दर्ज किया और अगले दिन से आने को कहा.अगले दिन हम लश्कर के ऑफिस पहुंचे और उसी व्यक्ति से मिले. उसके साथ एक और व्यक्ति वहां मौजूद था, उसने हमें 200 रुपये और कुछ कागजात दिये. उसके बाद उसने हमें एक स्थान मरकस तय्यबा, मुरिदके का पता दिया और वहां जाने को कहा. उसी स्थान पर लश्कर का ट्रेनिंग कैंप था. वहां हम बस से गए और कैंप के गेट पर कागजात दिखाये और अंदर दाखिल होने के बाद हमसे दो फॉर्म भरवाए गए. तब हमें असली कैंप एरिया में दाखिल होने की अनुमति मिली. ट्रेनिंग कैंप उक्त स्थान पर शुरू में हमें 21 दिनों का ट्रेनिंग दी गयी, जिसका नाम था, दौरासूफा। अगले दिन से हमारी ट्रेनिंग शुरू हो गयी। हमारा रोज का प्रोग्राम कुछ इस प्रकार था. 4.15- जागना और फिर नमाज़ 8.00- नाश्ता8.30-10.00-मुती सईद द्वारा कुरान की पढ़ाई10.00-12.00-आराम12.00-1.00-भोजन1.00-2.00-नमाज 2.00-4.00-आराम4.00-6.00-पीटी और गेम टीचर-फादूला6.00-8.00-नमाज और अन्य काम8.00-9.00- भोजन उपर की ट्रेनिंग पूरी कर लेने के बाद हमें दूसरे ट्रेनिंग केम्प दौराअमा के लिए चुना गया। यह भी 21 दिनों का ट्रेनिंग कैंप था. उसके बाद हमें एक स्थान, मंसेरा गांव ले जाया गया. वहां 21 दिनों तक हमें सभी हथियारों की ट्रेनिंग दी गयी. वहां रोज का हमारा प्रोग्राम कुछ ऐसा था.४-15-5.00- जागना और फिर नमाज5-00-6.00- पीटी इंसट्रक्टर- अबु अनस८-0- नाश्ता 8-30-11.30-हथियार चलाने की ट्रेनिंग, अब्दुल रहमान के द्वारा एके 47, ग्रीन-एसकेएस, यूजी गन, पिस्टल, रिवॉल्वर.११-30-12.00- आराम12.00-1.00- भोजन१-00-2.00- नमाज2.00-4.00- आराम4.00-6.00- पीटी6.00-8.00- नमाज और अन्य काम8।00-9.00- भोजन सीएसटी के बाहर अजमलये ट्रेनिंग पूरी कर लेने के बाद हमसे दूसरी ट्रेनिंग करने की बात कही गयी, लेकिन उससे पहले दो महिने की खिदमत करने को कहा गया। हम उस दो महिने की खिदमत को तैयार हो गये.अपने घर वापसदो महिने बाद मुझे माता-पिता से मिलने की अनुमति दी गयी। एक महिने मैं अपने घर रहा. उसके बाद आगे की ट्रेनिंग के लिए मुजफराबाद के सांइवैनाला स्थित लश्कर के कैंप में गया. वहां मेरे दो फोटो लेकर फॉर्म भरा गया. उसके बाद हमें छेलाबंदी पहाड़ी में दौराखास का ट्रेनिंग दी गयी. यह ट्रेनिंग 3 महिने की थी. इसमें पीटी, हथियारों का रख-रखाव और उनका इस्तेमाल, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लांचर और मोर्टार की ट्रेनिंग दी. रोज का प्रोग्राम ऐसा था.4.15-5.00- जागना और फिर नमाज5.00-6.00- पीटी इंस्ट्रक्टर अबु माविया8.00- नाश्ता8।30-11.30- हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लांचर, मोर्टार, ग्रीन, एसकेएस, यूजी गन, पिस्टल, रिवॉल्वर का प्रशिक्षण, अबू माविया के द्वारा.11.30.-12.00 आराम12.00-1.00 लंच ब्रेक1.00-2.00 नमाज2.00 - 4.00 हथियार चलाने की ट्रेनिंग और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के बारे में जानकारी.4.00-6.00 पीटी6.00-8.00 नमाज और अन्य कार्य8.00-9.00 भोजन सोलह का चयनट्रेनिंग के लिए 32 लोग वहों मौजूद थे. इन 32 में से 16 लोग जकी-उर-रहमान उर्फ चाचा के द्वारा एक गुप्त ऑपरेशन के लिए चयन किये गये. इन 16 ट्रेनियों में 3 लड़के कैंप से भाग गये. बचे हुए 13 लड़कों को काफा नामक व्यक्ति के साथ फिर से मूरीदके कैंप भेज दिया गया। मूरीदके में हमें तैराकी की ट्रेनिंग दी गयी और मछुआरे समुद्र में कैसे काम करते हैं, इसकी ट्रेनिंग दी गयी. हमने समुद्र में कई प्रायोगिक यात्राएं की. इस दौरान भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के काम करने की जानकारी हमें दी जा रही थी. साथ ही हमें भारत में मुसलिमों के खिलाफ दमन की विडियो क्लिपिंग भी दिखाई जा रही थी. इस ट्रेनिंग के समाप्त होने पर हमें अपने घर जाने की अनुमति दी गयी. मैं सात दिनों तक अपने परिवार के साथ रहा. इसके बाद में लश्कर-ए-तोयबा के मुजफराबाद कैंप चला आया. हम वहां 13 लोग थे. फिर वहां से हमें काफा मुरीदके कैंप ले गया.समुद्री अनुभवजैसा कि मैंने पहले कैंप के बारे में बताया फिर से वहां तैराकी की ट्रेनिंग दी जाने लगी। यह ट्रेनिंग 32 दिनों तक चली. यहां हमें भारतीय खूफिया एजेंसी के बारे में भी बताया गया. यहां हमें इस बात की भी ट्रेनिंग मिली की कैसे सुरक्षाकर्मियों से बचकर भगा जाये. हमें इस बात की भी ताकीद की गयी कि भारत पहुंच कर कोई भी पाकिस्तान फोन न करे. ट्रेनिंग में मौजूद 16 सदस्यों का नाम इस प्रकार है.मोहम्मद अजमल उर्फ अबु मुजाहिद, इसमाइल उर्फ अबु उमर, अबु अली, अबु अख्शा, अबु उमेर, अबु शोएब, अब्दुल रहमान (बड़ा), अब्दुल रहमान (छोटा), अदुल्ला, अबु उमरट्रेनिंग समाप्त होने के बाद जकि-उर-रहमान उर्फ चाचा ने हम में से 10 लोगों का चयन किया और उसे दो-दो के हिस्सों में बांट दिया, जो कि पांच टीम बनी। वह 15 सितंबर का दिन था.वीटीएस टीममेरी टीम में मेरे अलावा इस्माइल था। हमारा कोड वीटीएस टीम था. हमें इंटरनेट पर गूगल अर्थ के जरिये नक्शा दिखाया गया। इसी साइट के द्वारा हमें मुंबई के आजाद मैदान की जानकारी दी गयी. हमें वीटी रेलेवे स्टेशन का वीडियो दिखाया गया. जिसमें यात्रियों की भीडभाड दिखायी गयी. हमें यह आदेश दिया गया कि भीडभाड के समय सुबह के 7-11 या शाम के 7-11 बजे फायरिंग करनी है. इसके बाद कुछ लोगों को बंधक बनाना है और नजदीक की किसी बिल्डिंग की छत पर ले जाना है. छत पर पहुंच कर चाचा से कांटेक्ट करना है. इसके बाद चाचा इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपर्क नंबर देते और हमें मीडिया के लोगों से संपर्क करना था. चाचा के आदेश के बाद हमें बंधकों की रिहाई के लिए मांगे रखनी था. यह हमारे ट्रेनरों के द्वारा सामान्य शिक्षा दी गयी थी. इसके लिए 27 सितंबर 2008 का दिन तय किया गया था, लेकिन इसके बाद किसी कारणवश यह ऑपरेशन टाल दिया गया. हम करांची में रुके और फिर से समुद्र में बोट चलाने की प्रेिक्टस की. हम वहां 23 नवंबर तक रुके वहां की टीमें इस प्रकार थीं.दूसरी टीम: अबु अख्शा, अबु उमरतीसरी टीम: बड़ा अब्दुल रहमान, अबु अलीचौथी टीम: छोटा अब्दुल रहमान, अदुल्लापांचवी टीम: शोएब, अबु उमेर23 नवंबर को सभी टीम अजीजाबाद से चली. हमारे साथ जकि-उर-रहमान उर्फ चाचा और काफा भी थे. हम समुद्र तट के नजदीक पहुंचे. तब 4.15 हुए थे, वहÈ हमने लंच किया. 22-25 नॉटिकल्स माइल्स आगे बढ़ने के बाद हम एक बड़े से जहाज जिसका नाम अल-हुसैनी था, पर सवार हुये. जहाज पर सवार होते ही हम में से हरेक को 8 ग्रेनेड, एक-एक एके-47 राइफल, 200 गोलियों, दो मैगजीन और एक-एक सेल फोन दिया गया। इसके बाद हम भारत की सीमा की ओर चल पड़े.मुंबई पहुंचने परतीन दिनों की यात्रा के बाद मुंबई के नजदीकी समुद्री इलाके में पहुंचे तट पर पहुंचने से पहले ही इसमाइल और अदुल्ला ने भारतीय जहाज के चालक की हत्या कर दी। इसके बाद हम डिंघी पर सवार होकर बुडवार पार्क के समीप पहुंचे. मैं इसमाइल के साथ टैक्सी से वीटी रेलवे स्टेशन पहुंचा, रेलवे स्टेशन पहुंचते ही हम टॉयलेट गये और वहीँ हमने अपने हथियारों को लोड किया और बाहर निकलते ही अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अचानक से एक पुलिस ऑफिसर ने हम पर फायरिंग शुरू कर दी. जवाब में हमने उस पर ग्रेनेड फैंक दिया.इसके बाद हम फायरिंग करते हुये रेलवे स्टेशन के अंदर पहुंच गये. फिर हम स्टेशन से बाहर आ गये और एक बिल्डिंग तलाशने लगे, लेकिन हमें मनमाफिक बिल्डिंग नहीं मिल पायी. इसके बाद हम एक गली में घुस गये. वहां हम एक बिल्डिंग में चले गये. 3-4 मंजिल चढ़ने पर हमने पाया कि यह तो अस्पताल है. इसलिए हम फिर से नीचे उतरने लगे. इसी बीच एक पुलिकर्मी ने हमपर फायरिंग शुरू कर दी और हमने उस पर भी ग्रेनेड फेंक दिया. जैसे ही हम अस्पताल की चारदीवारी से बाहर निकले, तो हमें एक पुलिस की गाड़ी दिखायी दी। इसलिए हम एक झाड़ी के पीछे छिप गये.शूट आउट ऑन रोडएक गाड़ी हमारे आगे आकर रुकी. एक पुलिस ऑफिसर नीचे उतरकर हमपर फायरिंग करने लगा. मेरे हाथ में गोली लगी और मेरी राइफल नीचे गिर गयी. जैसे ही मैं नीचे झुका की एक दूसरी गोली फिर से मेरे उसी हाथ में लगी. मैं घायल हो गया. लेकिन इसमाइल उस अफसर पर फायरिंग करता रहा. वे लोग भी घायल हुए और फायरिंग बंद हो गयी. हमें उस गाड़ी तक पहुंचने में कुछ समय चाहिए था. उस गाड़ी में हमें तीन लाशें मिली, जिन्हें इसमाइल ने गाड़ी से नीचे फेंक दिया. फिर हम उस गाड़ी में सवार हो गये. कुछ पुलिस वालों ने हमें रोकने का प्रयास किया और इसमाइल ने उन पर भी फायरिंग की. कुछ आगे जाने पर एक बड़े से मैदान के समीप गाड़ी पंक्चर हो गयी. इसमाइल गाड़ी से नीचे उतरा और एक दूसरी कार, जिसे एक महिला चला रही थी को गन प्वाइंट पर रोक लिया. उसके बाद इसमाइल मुझे उस कार तक ले गया. क्योंकि मैं घायल था. वह खुद कार चलाने लगा. कुछ देर बाद समुद्र के किनारे हमारी गाड़ी रोक दी गयी. इसमाइल लोगों पर गोलियां बरसाने लगा. कुछ पुलिस वाले घायल हो गये और वो भी हमपर फायरिंग करने लगे. इसी दौरान इसमाइल भी घायल हो गया. इसके बाद पुलिस हमें किसी अस्पताल में ले गयी. अस्पताल में मुझे मालुम हुआ कि इसमाइल मर चुका है और मैं बच गया हूं.
(मेरा यह बयान हिंदी में पढ़कर मुझे समझा दिया गया है और यह पूरी तरह सही है। :मोहम्मद अजमल अमीर ईमान अलियास अबू मुजाहिद )

मुबंई हमले के बाद का राजनीतिक बंवडर


मुबंई आतंकवादी हमले के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक घटनाएं तेजी से बन-बिगड़ रही हैं। इधर अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस भारत आयी और पाकिस्तान को भारत के साथ सहयोग करने जैसे घिसे-पिटे बयान देकर चली गयीं, उधर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने वांक्षित आतंकवादियों को भारत को नहीं सौंपने की हेकड़ी दिखाकर स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान सुधरने वाला नहीं है और न ही आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक कारZवाई करने की उनकी इच्छा है। सबसे जो उल्लेखनीय स्थिति है वह यह कि भारतीयों का गुस्सा थम नहीं रहा है। खासकर सभ्रांत लोगों का कैंडिल यूनियन का जिनकी ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों पर भूमिका सीमित ही रहती है। पहली बार ऐसा हुआ कि आतंकवादी हमले में आम आदमी के साथ ही साथ सभ्रांत लोग भी मारे गये। इसी कारण नेताओं के खिलाफ कैंडिल यूनियन का ज्वार फूटा। ऐसे में यूपीए सरकार पर दबाव पड़ना ही था। केन्द्रीय गृहमंत्री िशवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देशमुख और गृहमंत्री आरआर पाटिल की कुर्सी छिनी गयी। संप्रग सरकार जोर-शोर से कह रही है कि सुरक्षा की नीतियां बदलेगी। सुरक्षा बलों और गुप्तचर एजेिन्सयों को और आधुनिक व वैज्ञानिक बनाया जायेगा, पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आया जायेगा, फेडरल जांच एजेन्सी बनेगी और आतंकवादियों को घटना के अंजाम देने के पहले ही पकड़ लिया जायेगा। देखने-सुनने में यह सब अच्छा उस हर नागरिक को लगेगा जो सही में देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और जिनमें आतंकवादियों को नकेल पहनाने मे विफल राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश उबल रहा है।मुबंई आतंकवादी हमले के बाद सत्ता और विपक्ष की राजनीति के अलावा ढेर सारे सवाल अनुतरित हैं। जिनके उत्तर की प्रतीक्षा और सच जानने की लालशा हमारे जैसे लेखकों और नागरिकों को है। वे सभी पहलू हैं, जिसमें बर्बर आतंकवादियों को निर्दाZष लोगों को मौत के घाट उतारने में सहयोग मिला, संसरक्षण मिला। सच क्या है? कही कुछ छुपाया तो नहीं जा रहा है। इसलिए कि स्थानीय वीभिषणों की भूमिका अभी तक उजागर ही नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में शक की सुई घुमनी कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता है।अब हम बात करते हैं मुबंई आतंकवादी हमले के बाद पक्ष और विपक्ष की राजनीति की। भारत दुनिया में शायद पहला ऐसा देश है जहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न को भी दलीय चस्मे और वोट की राजनीति के तहत देखा जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर अलकायदा के हमले के बाद दुनिया के प्राय: सभी देशों ने नयी-नयी जांच एजेिन्सयां बनायी, गुप्तचर एजेिन्सयों को आधुनिक व वैज्ञानिक बनाये। इतना ही नहीं बल्कि कड़े कानून भी बनाये गये ताकि आतंकवादियों को कड़ी सजा मिल सके। इसके विपरीत हमारे देश में क्या हुआ? एक पोटा कानून था जिसे भी वोट और दलीय राजनीति में शहीद कर दिया गया। काफी पहले से देश के अंदर में एक ऐसी जांच एजेन्सी और एक ऐसे कानून की मांग उठी है जो आतंकवाद का मुकाबला कर सके और जिसकी सीमाएं राज्यों की बाधा से परे हो। मुबंई आतंकवादी घटना के बाद यूपीए सरकार ने कड़े कानूनों से परहेज तो जरूर किया है पर उसने एक फेडरल जांच एजेन्सी बनाने पर राजी हो गयी है। इसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। दुंर्भाग्य यह है कि फेडरल जांच एजेन्सी के गठन पर भी राजनीति शुरू हो गयी है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने जरूर इस मसले पर यूपीए सरकार के समर्थन में खड़ी है।पर वामपंथी राजनीतिक दलों ने विरोध में राजनीति शुरू कर दी है। माकपा, भाकपा, फारर्वड ब्लाक और आरएसपी ने संयुक्त बैठक में प्रस्ताव पारित कर फेडरल जांच एजेन्सी के गठन के प्रयास का विरोध किया और इसे राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करार दिया है। सोचने-समझने की बात है कि अगर इस तरह के रवैया राजनीतिक दलों का रहेगा तो क्या देश रक्तरंजित आतंकवाद से लड़ पायेगा?हमें अमेरिकी वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद की अमेरिका की राजनीतिक स्थिति को याद करनी चाहिए। अमेरिकी दलों और नागरिकों की एकता को भी याद करनी चाहिए। अलकायदा के हमले के लिए जार्ज बुश सरकार की विफलता नहीं खोजी गयी, विरोध में तीखी प्रतिक्रिया नहीं हुई। राजनीतिक दल और नागरिक संगठन सभी जार्ज बुंश के समर्थन में खड़े हो गये। इतना ही नहीं बल्कि आतंकवादियों को उनके मांद में जाकर हमला करने का संकल्प और समर्थन मिला। अफगानिस्तान के तालिबान सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए बुश को पूरा समर्थन मिला। यही कारण है कि बुश अफगानिस्तान में तालिबान की सता समाप्त करने में कामयाब हुए। सबसे बड़ी बात यह है कि अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठन दुबारा अमेरिका में हमला करने का साहस तक नहीं कर सके। इसके उलट हमारे देश की राजनीतिक स्थिति को देख लीजिए। कमियां निकालने और विफलता को ज्वार चढ़ाने में समय गंवाया जाता है। विपक्ष ही नहीं सत्ता प्क्ष का रवैया भी कुछ ऐसा ही होता है। यूपीए सरकार का कहना है कि एनडीए सरकार के समय भी कारगिल कांड, संसद हमला कांड और इंडियन एयर लाइन्स अपहरण जैसे कांड हुए थे। इस तरह के बयान का मतलब क्या हो सकता है? मतलब है अपनी विफलताओं पर पर्दा डालना। वामपंथी दलों ने एक और राग छेड़ी है। वामपंथी दलों का कहना है कि आतंकवाद का मुद्दा भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में ही उठाये। वामपंथी दलों को शायद िशमला समझौता याद नहीं है। िशमला समझौते में पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मुद्दों को आपसी बातचीत से हल करने की संहिता है। अगर पाकिस्तान हमारे देश में आतंकवादी हमलावरों को संरक्षण दे रहा है तो प्रतिकार करने का हमारा अधिकार सुरक्षित है। राजनीतिक कदम जो उठे हैं उसे भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। केन्द्रीय गृहमंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को हटा देने मात्र से नागरिकों की आशांकाएं या चितंाए दूर नहीं हो सकती हैं। सबसे जो उल्लेखनीय तथ्य है वह यह कि मुबंई आतंकवादी हमले की पूरी व्यूह रचना उजागर नहीं हुई है। यह बात गहरी पैठ बन चुकी है कि भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार कहीं कुछ जरूर छुपा रही है। कोई आतंकवादी घटना बिना स्थानीय सहयोग और संरक्षण के हो ही नहीं सकता हैं। किन-किन लोगों ने आतंकवादियों को साधन उपलब्ध कराये हैं, इसकी पूरी जानकारी जनता को क्यों नहीं उपलब्ध करायी जानी चाहिए। ताज होटल में कई आतंकवादीं पहले से ही जमे हुए थे। हथगोले पहले ही पहुंचाये जा चुके थे। ऐसा बिना होटलकर्मियों की मिलीभगत से संभव ही नहीं हो सकता है। रतन टाटा यह मान चुके हैं कि आतंकवादियों के हमले की पूर्व सूचना उनके पास मौजूद थी। तो क्या ताज होटल प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं माना जायेगा। जिन ताजकर्मियों ने हथगोले अंदर पहुंचाने में मदद की थी उनके नाम क्यों नहीं उजागर किये जा रहे हैं।खतरनाक तो गुप्तचर एजेिन्सयों के बीच छिड़ा युद्ध है। हमारे गुप्तचर एजेिन्सयां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं। नौसेना का कहना है कि हमले की पूरी गुप्तचर जानकारी मिली ही नहीं थी। गुप्तचर एजेिन्सयों को आपस में लड़ने-झगड़ने से देश की सुरक्षा ही प्रभावित होगी। ऐसी प्रक्रिया तत्काल रोकी जानी चाहिए। जब तक राजनीतिक दलों और नागरिकों के बीच आतंकवाद को लेकर सर्वानुमति नहीं बनेगी तकतक हम आतंकवद के खूनी पंजों को नहीं मरोड़ सकते हैं। हमें अमेरिका की ओर तांकने की नीति छोड़नी होगी। स्वयं के बल पर पाकिस्तान को शांति का पाठ पढ़ाना होगा और आतंकवादियों को नेस्तनाबुत करना होगा। पर क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था अपना दलीय चेहरा और वोट की राजनीति से मुक्त हो सकती है। अगर नहीं तो फिर हम इसी तरह आतंकवाद का िशकार होते रहेंगे।

मंत्रीजी, होम क्वरंटाइन में घुमे जा रहे हैं

 बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री कोरोनाकाल में अश्वनी चैबे की जिम्मेवारियां काफी बढ जानी चाहिए। क्योंकि आम लोग उनकी हरेक गतिविधियों खासक...