उम्मीदें जवां हो गयीं...
21वीं सदी से 17 साल पहले और ठीक 17 साल बाद भारतीय क्रिकेट वैसा ही इतिहास रचने में भले ही कामयाब न रहा हो. लेकिन काफी कुछ हासिल करने में कामयाब भी रहा. 1983 में कपिल देव की अगुवाई में इसी लॉर्ड्स के मैदान पर विश्व कप जीत कर इतिहास रचा था. और आज वुमन इन ब्लू फाइनल तक पहुंची. वाकई निःशब्द. चक दिया. इस साल के शुरुआत में कौन जानता था कि वुमन इन ब्लू विश्व कप खेल भी पायेगी. जिस टीम को विश्व कप में खेलने के लिए क्वालीफाइ टूर्नामेंट खेलना पडा हो. वह टीम न सिर्फ विश्व कप खेली बल्कि फाइनल तक पहुंची. विश्व कप में लगातार दो मैच गंवाने के बाद हर एक मैच से भरोसा बढता गया और उम्मीदें जवां होती गईं. अब यहां से देश में महिला क्रिकेट का एक नये दौर देखने को मिलगा. फाइनल मैच. बेहद रोमांचक. नाखुन कुतरने वाला. भारतीयों के लिए और इंग्लैंड के दर्शकों के लिए भी. कप्तान मिताली राज तो अंत तक अपना पैड तक नहीं उतारा. सांसे थमा देने वाला फाइनल का महा मुकाबला. इंग्लैंड की टीम को बड़े मुकाबले खेलने का अनुभव के आगे हमारे सिर्फ दो ही खिलाडी झूलन और मिताली राज ही टिक सकती थीं. लेकिन जिस तरह से लडकियों ने खेला उसके लिए सभी को बधाई.
क्रिकेट की दुनिया में भगवान का दर्जा पा चुके मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर का मानना है कि 22 वर्षों के क्रिकेट करियर में पांच बार विश्वकप में असफलता के बाद मिली सफलता से उन्होंने जाना कि उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए. सचिन जैसे को भी कई बार विश्व कप सेमीफाइनल व फाइनल में हार का मुंह देखना पड़ा. इसलिए वुमन इन ब्लू से उम्मीदें बढ गईं हैं.
#WWCFinal17
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