Sunday, October 15, 2017

किसी मंच पर महिला किसान नहीं दिखतीं

@राष्ट्रीय महिला किसान दिवस विशेष
(7 मिनट में पढ़ें )
'न हमें सुनते हैं, ना सुनाते हैं. टीवी वाले पत्रकार कैमरा - माइक लेके आते हैं, कलम - काॅपी वाले भी पत्रकार आते हैं. लेकिन हमसे कोई कभी बात नहीं करता. हम भी न्यूज चैनल देखते हैं, बहसों में भी कभी हम जैसी को नहीं दिखाते. क्या सभी समस्या पुरुष किसानों की ही हैं, हम महिला खेतीहरों की कुछ भी नहीं.' अहले सुबह गुडगांव अब गुरुग्राम से थोड़ा आगे बढते ही एक खेत में कुछ महिलाओं को काम करता देख अनयास ही उनसे बात करने का मन हुआ. उनके पास गया, तो यह सब कुछ सुनने को मिला. उनमें से एक अनीता जो खुद को ग्रेजुएट बताते हुए कही, आप किसी भी भाषा का न्यूज चैनल देखो या पेपर पढो कभी किसी में महिला किसानों की एक शब्द भी बात होती है. हां आत्महत्या करने वाले की विधवा से भावनात्मक सवाल - जवाब जरुर दिखता - सुनता है. इतना ही भर. मैं भौचक, उनकी खरी खोटी सुनता गया. मैं उनसे समझने - बुझने कुछ और गया था और बात क्या शुरू हो गयी. लेकिन, बात में दम था और वाजीब भी. इसकी पड़ताल करने की भी जरुरत नहीं. यह शायद यद हमारी सहज प्रवृती भी है कि जब भी जेहन में किसान शब्द उभार लेता है, तो पुरुष किसान की ही छवि उभार लेती है. पता नहीं क्यों ऐसा? जबकि हम बचपन से महिलाओं को खेतों में फसलों की कटाई, छटाइ, बुआई, रोपनी, खर-पतवार उखारते....मवेश्यिों के लिए चारा उनका देखभाल, खाद बनाते आदि करते देखते आये हैं. इतना सब करते हुए घर का काम तो है, ही. वाकई अनीता की बातें सौ फीसदी सही है. सरकारी (जनगणना) आंकडों की माने तो देश में लगभग दस करोड़ महिलाएं खेती- किसानी से जुडी हैं. जबकि 2001 में यह आंकडा पाच करोड़ तक ही सीमित था. पिछले 20 सालों में तीन लाख से ज्यादा किसान अत्महत्या कर चुके हैं, ऐसे में महिला किसानों की बातों की अनदेखी......कम से कम किसानों की विधवाओ ( जो अभी भी खेती करने को मजबूर है, क्योंकि आजीविका का दूसरा कोई उपाय नहीं) की भी सुध कोई नहीं लेता दिखता. आंदोलन चाहे जंतर- मंतर पर हो या मंदसौर कहीं भी, सरकार से या किसी कांफ्रेंस में बात करते कोई महिला किसान नहीं दिखतीं. इसलिए, जरा इनकी भी सुनो - सुनाओ.
हम आप चाहे जितना भी नजरंदाज कर लें, लेकिन आने वाला समय इनकी जिद के सामने सब बौना पड़ जायेगा. कुछ दिन पहले बिहार के समस्तीपुर जाना हुआ. मोहद्दीनगर से विद्यापति धाम यात्रा के दौरान की एक वाक्या है. खेत में काम रही कुछ महिलाएं मिलीं. उनमें से एक ने अपना नाम बबीता बताया. जैसे ही मैने कहा 'बबीता देवी' यह बताइए... वह एक दम से रोकते हुए बोल पड़ी. देवी. देवी काहे? देवी नै. देवी त भगवान होवे हथिन. जिनकर हम सब पूजा करै हियै. हुंवा देखु. उ पेड़ के नीचे देवी माई के मंदिर हइ. हम किसान हती. किसान. इसके बाद मैं और सवाल क्या करता. सिर्फ उन्हें सुनता रहा. उन्होंने बताया, पहले हमें जो कहा जाता था, वैसा ही करना हमारी मजबूरी थी. अब हम खेत से संबंधी हरेक बीज, खाद, बुआइ, कटाई, पटवन ... सब कुछ का निर्णय करते हैं. वहां कुछ किसान (अब केवल औरत या महिला कहने की हिम्मत नहीं रही) अपने नौनिहालों  को गोद में लिए खडी थी. बगल में ही तीन से पाच साल तक के बच्चे मिट्टी  में  लोट - पोत के खेल रहे थे. बबीता बगैर रुके सुना रही थी. केवल पुरुष को ही किसान समझा जाता है, क्योंकि उनके नाम पर खेत है. हम हमेशा से खेत में काम करते आ रहे थे, लेकिन एक पैसा मुयस्सर नहीं होता था. कई बार हमारे बच्चे भूखे सो जाते थे. हमारी जिंदगी तो परिवार के लिए खाना बनाने और खेत में काम करने तक ही सीमित थी. अब हमारे नाम पर खेत है. हाथ में पैसा है. बचाते हैं. पहले से बेहतर खाते खिलाते हैं.

देश में कुल खेती के जमीन का महज 13 फीसदी पर ही महिलाओं का मालिकाना हक है. बाजार से लेकर निर्णायक मंडल तक से महिलाएं अलग- थलग हैं. ऐसे में उन्हें जानकारी का अभाव लाजमी है. और इस कारण वे निर्णायक भूमिका में नहीं है. आत्मविश्वास आत्मविस और आत्मनिर्भरता के लिए बदलाव आवश्यक है. हम लोग बचपन से सुनते आ रहे हैं, जब राजा जनक के राज्य में सुखाड़ पड़ा था, तब राजा के साथ रानी ने खेत में हल चलाया था, तब कहीं जाकर बारिश हुई थी. इसलिए खुशहाली के लिए महिला किसानों की अनदेखी कानूनी अपराध नहीं तो नैतिक अपराध तो है ही..

No comments:

Post a Comment

इस खबर पर आपका नजरिया क्या है? कृप्या अपने अनुभव और अपनी प्रतिक्रिया नीचे कॉमेंट बॉक्स में साझा करें। अन्य सुझाव व मार्गदर्शन अपेक्षित है.

मंत्रीजी, होम क्वरंटाइन में घुमे जा रहे हैं

 बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री कोरोनाकाल में अश्वनी चैबे की जिम्मेवारियां काफी बढ जानी चाहिए। क्योंकि आम लोग उनकी हरेक गतिविधियों खासक...